D_Enquiry_254_2008

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL APPELLATE JURISDICTION


CIVIL APPEAL NO. 254 OF 2008


STATE OF U.P. & ORS. .APPELLANT(S)
VERSUS
SAROJ KUMAR SINHA .…RESPONDENT(S)


J U D G M E N T
SURINDER SINGH NIJJAR, J.

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सरोज कुमार सिन्हा (2010) मामले का सारांश निम्नलिखित है:

  • मामले की पृष्ठभूमि: प्रतिवादी (सरोज कुमार सिन्हा) लोक निर्माण विभाग (PWD) में अधिशासी अभियंता के पद पर कार्यरत थे। फरवरी 2001 में, उनके विरुद्ध कदाचार के गंभीर आरोपों के तहत आरोप-पत्र (charge sheet) जारी किया गया और उन्हें निलंबित कर दिया गया।
  • मुख्य विवाद: * प्रतिवादी ने अपनी रक्षा और उत्तर तैयार करने के लिए उन दस्तावेजों की प्रतियों की मांग की थी, जिन पर आरोप आधारित थे।
    • विभाग ने इस आधार पर दस्तावेज देने से इनकार कर दिया कि प्रतिवादी उसी डिवीजन में तैनात थे और दस्तावेज उनकी कस्टडी में होने चाहिए थे।
    • जांच अधिकारी ने प्रतिवादी को सुने बिना और बिना किसी गवाह का बयान दर्ज किए एकतरफा (ex-parte) जांच रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी।
  • उच्च न्यायालय का निर्णय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी को सेवा से हटाए जाने के आदेश को रद्द कर दिया और उन्हें सभी लाभों के साथ बहाल करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने पाया कि जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है।
  • उच्चतम न्यायालय का निष्कर्ष: * दस्तावेजों की आपूर्ति: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक कर्मचारी को प्रासंगिक दस्तावेज नहीं दिए जाते, वह प्रभावी ढंग से अपना बचाव नहीं कर सकता। निलंबन के बाद कर्मचारी से यह अपेक्षा करना गलत है कि वह स्वयं कार्यालय से दस्तावेज प्राप्त कर लेगा।
    • एकतरफा जांच की प्रक्रिया: यदि कर्मचारी जवाब नहीं देता है, तब भी जांच अधिकारी को जांच की तारीख तय करनी चाहिए और विभाग को अपने आरोपों को साबित करने के लिए साक्ष्य पेश करने चाहिए। जांच अधिकारी को एक स्वतंत्र निर्णायक के रूप में कार्य करना चाहिए, न कि विभाग के प्रतिनिधि के रूप में।
    • प्राकृतिक न्याय: अनुच्छेद 311(2) के तहत विभागीय जांच में निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय अनिवार्य है। किसी भी व्यक्ति को सुने बिना दंडित नहीं किया जा सकता।
  • अंतिम आदेश: उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया और राज्य की अपील को खारिज कर दिया, क्योंकि पूरी जांच प्रक्रिया कानूनी रूप से दूषित थी।

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